वो कभी थे ,पर कभी नही थे
वो कभी थे ,पर कभी नही थे
वो जो कभी पास थे ,पर अपने नहीं थे
वो जो कभी आधी रात चाय की दुकान पे थे
तो कभी दिन दहाड़े मधुशाला में भी थे
वो जिनकी जेबे छोटी, पर दिल बड़े थे
वो कभी पेपर की रातो में भी,
नशे में धुत पड़े थे
वो कभी हमारी हर गलती पे भी,
वो कभी अपनी अपनी जिद पे भी अड़े थे
वो वही थे, जिन्हे दिल के सरे राज बताया करते थे
वो थे तो मसखरे, पर गंभीर मुद्दे भी सुलझाया करते थे
वो, वो कभी मित्र तो कभी राजदार बन जाया करते थे
वो कभी सगो से भी सगे, कभी अनजान बन जाया करते थे
वो लड़कपन के प्यार की टीस साँझा करते थे
वो अपने सपने, अपनी हार, अपनी जीत भी साँझा करते थे
वो, वो आज भी हैं , पर थोड़े बड़े हो गए हैं
हमारी दोस्ती, हमारा अपनापन और हमारा प्यार तो हैं
रात बीत जाने पे दीपक जले तो क्या फायदा
वो उदास तो हैं पैर मिले पर मिले नही तो क्या फायदा
मशाल हो पर अँधेरा दूर न हो तो क्या फायदा
चार यार तो हो पर ठहठके न हो तो क्या फायदा
जब साथ साथ हैं, तो पास पास भी होने चाहिए
ये गिलास कब तक खाली रहे, अब इनमे जाम भी होने चाहिए
दिल हलके, दिमाग में राहत और मस्ती भरी शाम भी होनी चाहिए
वो , वो जो थे , जो हैं और होंगे भी "खिलौना " उनके नाम भी पैगाम होना चाहिए



