Monday, June 25, 2012

Mulakat...

                                          मुलाकात  

एक  बार चलते चलते यू ही, प्यार मुझे  प्यार पड़ा हुआ मिल गया 
मुझे देखकर, मुरझाये फूल सा खिल गया

मने पुछा केसे हो भाई,
कहने लगा
इंसान की सूरत देखने को तरस रहा हू
बिना जल की मछली की तरह  तड़प  रहा हू
प्यार हू, प्यार के लिए भटक रहा हू,
कोई इंसान बने तो मुझे भी अपना ले
इसी उम्मीद में लटक रहा हू
कश्मीर से लाहोर,लाहोर से कश्मीर यात्रा  कर रहा हू

में थर्राया,गरमाया, काले-कलूटे तवे की तरह तिम-तिमाया
और पुछा क्या मैं तुम्हे इंसान नही दीखता
दो कान,दो आँख,दो हाथ, दो पैर और एक नाक मेरी भी हैं

सूखे तलब सी सही, थोड़ी बुद्धि तो मेरी भी हैं

वो मेरे शकुनी मामा की तरह मुस्कुराया
थोडा ठेरा  फिर  और फिर फ़रमाया
कहने लगा
इंसान दिखते तो हो पर हो नही
कुम्भकरण सी भूधी के साथ ,इंसानी शरीर भी रखते हो
तुमसे अछे तो जानवर हैं
कम से कम १ दूजे के पार्टनर हैं

भूख लगे तो जायदा से जायदा शिकार करते हैं
तम्हारी तरह कभी वर्ल्ड ट्रेड तो कभी पार्लिमेंट पे हमला नही करते हैं

ये सुन कर मेरा गुसा कोका-कोला की बोतल की तरह ठंडा पड़ गया
प्यार करने और करते रहने का मन कर गया
यू लगा जेसे तडपती मछली को अपना जल मिल गया
बन के 'खिलौना' प्यार के हाथो में बंधे रहने का  मन कर गया


 

 
 




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3 comments:

  1. yeh pyar ka dard sunkar main bhi soch raha hu ki kyu naa kahu..... un so called insaano se lete kyu nahi Minto fresh... ............................................................................................................................................
    jo dimag ki batti jala de...

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  2. achcha likha hai....mubarak ho tumhe pyaar,,,,,,,take care

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  3. achcha likha hai,,,,mubarak ho tumhe pyaar,,khyal rakhna apne pyaar ka..take care

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